संगत का प्रभाव (गरीब गोपाल के तीन बेटे) – राजेंद्र मारकण्डेय

संगत का प्रभाव – (लेख) राजेंद्र मारकण्डेय

गरीब गोपाल के तीन बेटे थे।
खेती किसानी और मजदूरी करते हुए गांव के सरकारी स्कूल में तीनों बच्चों को पढ़ाया। गांव में गोपाल के अच्छे कार्य व्यवहार और मेहनत की प्रशंसा होती थी। तीनों बच्चे भी अपने पिताजी के नक्शे-कदम पर चलने वाले थे -मृदुभाषी और व्यवहारशील। कभी-कभी अपने पिताजी के काम में हाथ बंटाते थे। सबसे छोटा बेटा करण थोड़ा चंचल स्वभाव का था। एक दिन पड़ोसी के बाड़ी से खीरा चोरी करके लाकर अपने मां को दिया। तो मां ने बचपना समझकर कुछ नहीं कहा।

15 साल में समय चक्र में काफी बदलाव देखने मिला। कोरोना काल में पिताजी स्वर्ग सिधार गए। तो अब बड़ा बेटा राजा खेती किसानी देखता है।मंझला बेटा विजय फौज में देश सेवा कर रहा है। और सबसे छोटा बेटा करण अभी किशोरावस्था में ही था।पर अपने चाचा का चारपहिया गाड़ी चलाता है।

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बाकी का जिंदगी तो समान्य चल रहा था।पर सबसे ज्यादा परिवर्तन छोटे बेटे करण के जीवन में देखने मिल रहा था।
चाचा ने उधारी के पुरानी चारपहिया वाहन खरिदा था। जिसमें ट्रांसपोर्टिग का कम करता था। अधिकतर अवैध खनिज सप्लाई ही करता था।

जिससे मोटी कमाई करके, अपने बच्चों को शहर में अच्छे स्कूल में पढ़ने भेजा था।
और कम खर्चे में ड्राइवर के चक्कर में करण को किशोरावस्था में ही उनके चाचा ने चारपहिया वाहन चलाना सिखा दिया था।

यह करण के जिंदगी का सबसे परिवर्तनकारी समय था। चाचा अवैध खनिज सप्लाई करने के चक्कर में अधिकतर रात को ही करण से गाड़ी चलवाता था। और सामने गाड़ी रोकने कोई पुलिस वाला या ग्रामीण आता, तो करण को उसपर गाड़ी चढ़ा देने का हिम्मत देता था। ऊपर से रात जागरण के कारण शराब का नशा करना भी सिखा दिया।इधर परिवार वाले निश्चिंत थे कि चाचा के साथ करण गाड़ी चलाना सिख रहा है।पर असल में करण अब पहले से काफी बदल चुका था…बात – बात में गाली- गलौज, कई प्रकार के नशापान और परिवार के बातों का अनसुना करना।

पैसे कम देने कि बात पर झगड़ा होकर करण अब चाचा से अलग हो गया था।पर उनके संगति में सीखा गया दुष्प्रभावों से कभी अलग नहीं हो सका।

शहर में गाड़ी चलाने गया करण अब गुनाह के बड़े-बड़े पंडितों के सानिध्य में कोचिंग ले रहा था। तथा नशा और अपराध के लगभग सभी कृत्यों में शामिल हो रहा था। इस बीच एक महिला के सामुहिक दुष्कर्म करके हत्या करने के आरोप में जेल चला गया। जिसे परिवार ने खेत को बेचकर, किसी तरह से छुड़ाकर घर लाया था। इस दौरान करण की शादी हुई। बच्चे आए। और घर परिवार में किसी सेठ का गाड़ी चलाकर जीवन जी रहा था।पर उनकी बुरी आदतें नहीं छूट रही थी। नशापान करके गाली-गलौज और लोगों से लड़ाई-झगड़ा करना।

एक दिन की बात है।करण को सेठ ने वेतन का पैसा दिया था।करण आज सुबह से ही गांव का महुआ शराब पीकर लोगों से गाली-गलौज कर रहा था। इस बीच सामना चाचा के छोटे बेटे राजू से हो गया। दोनों किसी बात पर उलझ गए।इस दौरान करण से राजू कि हत्या हो गई। पुलिस करण को पकड़कर जेल भेज दिया। जहां करण के केश हिस्ट्री को देखते हुए समाज के लिए खतरा करार देते हुए फांसी की सजा दिया गया।

इसमें एक बात बताना जरूरी है, कि करण को चाचा के बेटे राजू के हत्या करने पर पकड़कर ले जाने वाले पुलिस और फांसी की सजा सुनाने वाले जज सहपाठी थे। जो करण के साथ ही पढ़े थे।पर संगति अच्छे लोगों के साथ ही किए थे। जिसके कारण आज सम्माननीय जीवन जी रहे हैं। इधर करण और चाचा दोनों के परिवार में भारी तनाव का माहौल था। और गांव में लोग करनी की सजा बोल रहे थे,चाचा और करण दोनों के लिए।

फांसी की सजा का दिन मुकर्रर हुआ। करण ने अपने मां से मिलने की इच्छा जताई। प्रशासन ने सोचा शायद करण अपने करनी पर मां के सामने पश्चाताप करेगा।उनके मां से मुलाकात करवाई। पर सभी स्तब्ध थे,कि अचानक करण ने अपने मां का नाक क्यों काट दिया!

मां के नाक का बड़ा हिस्सा करण ने अपने दांतों से काट दिया था। लहुलूहान मां को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
करण से जज ने इस दुष्कृत्य का कारण पूछा।तो करण ने बताया- कि मेरे हिसाब से,मेरे गुनाह के रास्ते कि शुरुआत, बचपन में पड़ोसी के बाड़ी से खीरा चुराने से हुई थी।अगर उस समय मेरी प्रथम गुरू मां ने मुझे अनदेखा करने के बदले, मुझे डांटकर मना कर देती,सही -गलत की परख करा देती, तो शायद मुझे आज फांसी नहीं होती। चाचा तो पराया था। उसकी सजा मैंने उसे दे दिया। और मुझे भी मिल रहा हैं।पर मेरे हिसाब से सबसे बड़ी गुनाहगार – मेरी मां हैं।
अंतिम बयान के बाद करण को फांसी दी गई।

करण के मृत शरीर को उनके परिवार को सौंपा गया। गांव में दाह-संस्कार किया गया।
इस घटना के बाद लोग आपस में बात कर रहे थे- कि संगत के प्रभाव ही है, कि एक सीधा -सादा व्यक्ति का अच्छा बेटा बिगड़ गया। साथ में शांति भोज के साथ शांति पाठ में संत कबीर के शब्द चल रहे थे…
“कबिरा संगत साधु कि, ज्यों गंधी की बास।
ज्यों गंधी कछु देय नहीं, तो भी बास सुभाष”।।

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