सुरहुत्ती के दीया- मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई

सुरहुत्ती के दीया- मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई

(राजेंद्र मारकण्डे- रचनाकार) आज सुरहुत्ती तिहार हरे। सबो डाहर फटाका के शोर अऊ दीया बाती के उजियारा बगरे हे।नवा कपड़ा पहिरे लइका जवान सियान मन खुशी मनात अपन घर में लक्ष्मी के पूजा करतथे।

ये सब के बीच मोर मन उदास हे।काबर कि एक साल पहिली हमर मंडलीन दाई ह ये दुनिया ल छोड़ के चल दिस,तेकर मया सुरता में हमर मंडल बबा ओकर कुछ दिन बाद वहु चल दिस दुनिया ल छोड़ के।

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मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई के बीच ये मया ल देख के हम जवनहा मन ल सीख मिलथे, कि कइसे रिस्ता ल निभाए जाथे,जेन मन आज कल बिहाव के दू चार महिना में छोटे – मोटे बात ल लेके अलग – बिलग हो जथे।अनभोरहा में मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई के बिहाव होए रिहिस। बचपन के रिश्ता ल जीवन भर मया पिरित में बांध के उम्मर भर निभइस।

अइसे नइ ए कि मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई अपनेच मन ल मया करें।ओ मन मया के मुरत रिहिस।जतना मया एक दूसरा ल करें,ओतने मया हमूमन ल करें।उंकर मया दुलार में हमन,अपन दाई-ददा अऊ दाई-बबा के मया ल भुलागे रेहेन।

बिहिनिया हमर आंखी खुले तेकर बाद ले,रतिहा आंखी के मुंदावत ल, हमन मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई ल हमर घर में कहीं कुछू करत देखत रेहेन।

हमर बबा बताए रिहिस कि बड़ बछर पहिली, हमर गांव में गाय-गरवा के चराय बर कोनों राउत नइ रिहिस,त हमर बबा ह, आने गांव ल मंडल बबा ल लाए रिहिस।

हमरे बाड़ा के एक कुरिया में राहय, अऊ गांव के संग हमरो घर के गाय – गरवा के सेवा जतन करें। कुछ बछर बाद हमर बबा ह मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई के बिहाव करिस।तेकर बाद मंडलीन दाई ह हमर घर के घर-बर्तन के साफ-सफाई अऊ कुआं ले पानी जइसे घरेलू काम में हाथ बटाय।

मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई ह हमर खून के रिश्ता भले नइ रिहिस लेकिन ओकर से कम भी नइ रिहिस।उंकर बिना हमन कभू कोई तीज- तिहार नइ मनाएन।सुख -दुख के हर काम में परिवार बनके रिहिस।

एक बार के बात आय कि कुछ साल पहिली हरेली तिहार के दिन,मंडल बबा के तब्यत थोड़कीन खराब हो गे रिहिस।शहर में इलाज कराए बर भर्ती करें रिहिस।अऊ ओ दिन हमर घर मंडल बबा के सुरता में चुल्हा में तिलइ नइ चढ़ीस।जभे मंडल बबा ह वापस बने हो के अइस,तभे हमर घर में सोहारी रोटी बनिस।

अइसे बात नइ ए,कि मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई के कोने लइका लोग नइ ए।एक बेटा अऊ एक बेटी हवे।चार साल पहिली बेटा अऊ बेटी के बिहाव होइस बेटी ल बिदा करिन,अऊ बहू ल लाइन।चार महीना बेटा-बहू बने रिहिस।तहन कोनो बात ले झगरा करके बहू अपन मइके चल दिस।अऊ बहू ह, एके शरत में लड़का संग रहू कहिस,जब लड़का ह शहर में दाई – ददा ल छोड़ के रइही,तभे जाहू कहिस।मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई ह अपन करेजा में पथरा रख के एक झन दुलवा बेटा ल बहू संग शहर भेज दीस,जिहां बेटा ह मिस्त्री काम में जाथे अऊ बहू ह दूसर घर पोछा लगाथे।

आज तिहार में मोर आंखी ह मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई के सुरता में आंसू ले भर गे।मोला याद हे, कि परिवार में बिहाव खातिर हमर जम्मो परिवार ह आने गांव चल दिस,लेकिन हमर परीक्षा के खातीर हमन ल मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई के कोरा में छोड़ दिस।अऊ रतिहा में मोला बुखार आगे, मोला लागिस कि मेह काली के परीक्षा ल नइ दिला पाव,लेकिन मंडल बबा अऊ मंडलीय दाई के सेवा से मै ठीक होगेव अऊ परीक्षा भी दीला पाएव।

मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई दिल के मंडल रिहिस तेकर सती हमन ओला मंडल-मंडलीन काहन।वइसे हमन ओकर नाम का रिहिस तेला कभो नइ जानन।काबर कि घर में सब बड़े – बुजुर्ग मन घलो ओमन ल मंडल-मंडलीन ही पुकारे।
एक दिन हमन परिवार सहित शहर के मंदिर घूमे ल गे रेहेन।

दर्शन करके निकलत रेहेन त एक दीवार में चूना रंग में लिखाए देखेन… ठग रऊतइन से सावधान।मोर गुस्सा तरवा में चढ़गे। तुरते बाल्टी में पानी लाके कपड़ा में पोछेव,चुना लगइया मन के चुना निकलगे।मया अऊ सेवा के मूरत ल कोनो ठग केहे के हिम्मत कइसे करिस।

मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई के,ए दुनिया ल छोड़े के बाद अब हमर गांव में कोनो घर गाय-गरवा नइ ए।सब ढील दीस।ए गांव ल ओ गांव रेंगा दीस।अब लोगन ल दूध नइ पचते,जहर- महूरा ल ठंडा अऊ दारू के नाम में पियथे।तीज – तिहार में दूध, मिठई अऊ पनीर ल दुकान ल खरिद के लाथे,वहू में मिलावट के बात सुने ल मिलथे।

अब अलग-अलग तिहार में मंडल बबा- अऊ मंडलीन दाई ह घरो-घर नइ दिखे।ना अब कोने तिहार में रौनक हे।
पिछले बछर ल हमर गांव में हरेली तिहार में ना कोई बिजकुटनी मांगिस,ना गरवा ल दवाई-लोंदी खवइस,ना कोई गरवा ल सोहई बांधिस, ना कोने हाथा दीस,ना गोवार्धन खुंदवाइस,ना कोने मातर में कुम्हड़ा ढूलइस,ना खीर खवइस,ना कोनो दोहा पारिस,ना कोनो जोहारे ल अइस…
जइसे मइय्या लिए- दिए,
तइसे देबो आशीष रे।
अन्न – धन तोर कोठी भरे…।
काबर कि हमर गांव-घर के दूठन दिया बुझागे…
सुरहुत्ती के दीया मंडल बबा अऊ मंडलीन दाई।

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