तरीघाट में मुक्तिधाम के नाम पर सिर्फ आश्वासन! अंतिम संस्कार भी भगवान भरोसे

* तरीघाट में मुक्तिधाम के नाम पर सिर्फ आश्वासन! अंतिम संस्कार भी भगवान भरोसे…
* सालों से आवेदन-निवेदन और खबरों का सिलसिला जारी.?
* अफसरों के आश्वासन के बावजूद धरातल पर एक ईंट तक नहीं—बारिश में वैकल्पिक व्यवस्था के भरोसे ग्रामीण…

तरीघाट में मुक्तिधाम के नाम पर सिर्फ आश्वासन! अंतिम संस्कार भी भगवान भरोसेपाटन। जिस गांव में जन्म से लेकर मृत्यु तक की व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन और पंचायत की होती है, उसी तरीघाट गांव में अंतिम संस्कार के लिए भी ग्रामीणों को स्थायी जगह नसीब नहीं हो रही है।

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सरकारी मुक्तिधाम की मांग को लेकर ग्रामीण और पंचायत प्रतिनिधि लगातार आवेदन-निवेदन कर चुके हैं। अधिकारियों को मोबाइल के माध्यम से समस्या से अवगत कराया गया, अखबारों में खबरें प्रकाशित हुईं, कार्रवाई के आश्वासन भी मिले, लेकिन मुक्तिधाम आज भी जमीन पर नहीं, बल्कि फाइलों और आश्वासनों में दिखाई दे रहा है।

खबरें छपीं, आवेदन पहुंचे, फिर भी नहीं जागा प्रशासन
तरीघाट में सरकारी मुक्तिधाम की जरूरत कोई नई मांग नहीं है। ग्रामीण लंबे समय से इसकी मांग कर रहे हैं। पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा भी संबंधित अधिकारियों के समक्ष कई बार आवेदन और निवेदन किया गया। मीडिया के माध्यम से भी जिम्मेदारों का ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर दिलाया गया।

इसके बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। सवाल यह है कि जब समस्या की जानकारी अधिकारियों को है, आवेदन भी पहुंच चुके हैं और खबरें भी प्रकाशित हो चुकी हैं, तो फिर कार्रवाई आखिर रुकी कहां है?

बारिश में अंतिम संस्कार की मजबूरी
तरीघाट में मुक्तिधाम के नाम पर सिर्फ आश्वासन! अंतिम संस्कार भी भगवान भरोसेमुक्तिधाम जैसी मूलभूत सुविधा के अभाव में ग्रामीणों को वैकल्पिक व्यवस्था के भरोसे रहना पड़ रहा है। बारिश के मौसम में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। बरसते पानी के बीच अंतिम संस्कार करना मृतक के परिजनों के लिए असहनीय परिस्थिति बन जाती है।

एक ओर प्रशासन गांवों में विकास और मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के दावे करता है, वहीं दूसरी ओर तरीघाट के ग्रामीण अंतिम संस्कार जैसी अंतिम और अनिवार्य जरूरत के लिए भी स्थायी व्यवस्था का इंतजार कर रहे हैं।

फॉलोअप में अफसरों के बयानों ने बढ़ाए सवाल
मामले में जब फॉलोअप करते हुए हमारी टीम ने अधिकारियों से चर्चा की तो एक और चौंकाने वाली स्थिति सामने आई। मामले को लेकर अधिकारियों के बीच ही विरोधाभास नजर आया। अलग-अलग स्तर पर जिम्मेदारी और कार्रवाई की स्थिति को लेकर स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाया।

ऐसे में ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर उनकी समस्या का जिम्मेदार कौन है? आवेदन किसके पास जाएं, जवाब किससे मांगा जाए और कार्रवाई के लिए किस अधिकारी के दरवाजे पर दस्तक दी जाए?

कागजों में दौड़ रही फाइल, जमीन पर नहीं दिख रहा मुक्तिधाम
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें हर बार कार्रवाई का भरोसा दिया जाता है, लेकिन धरातल पर कोई ठोस परिणाम दिखाई नहीं देता। आवेदन आगे बढ़ते हैं, आश्वासन मिलते हैं और मामला फिर फाइलों में दब जाता है।

अब सवाल सिर्फ मुक्तिधाम बनाने का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का है। आखिर कब तक तरीघाट की जनता अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर निर्भर रहेगी? क्या प्रशासन किसी अनहोनी या विकट परिस्थिति का इंतजार कर रहा है?

जनता पूछ रही है—मुक्तिधाम कब बनेगा?
ग्रामीणों की मांग अब आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई की है। प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि मुक्तिधाम के लिए अब तक क्या प्रक्रिया हुई, प्रस्ताव कहां लंबित है, किस स्तर पर स्वीकृति बाकी है और निर्माण कब तक शुरू होगा।

क्योंकि मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार भी यदि व्यवस्था के भरोसे करना पड़े, तो गांव में विकास के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

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